प्राय योगी और सिद्ध पुरुष इसी मुद्रा में बैठते हैं इसलिए इसे सिद्धासन कहते हैं आपने अनेक महापुरुषों को इसी मुद्रा में बैठे हुए देखा भी होगा इस आसन में लंबे समय तक बैठकर सिद्धि प्राप्त की जाती है
विधिभूमि पर बिछी दरी पर दोनों टांगों को सामने की ओर फैला कर बैठ जाएं बाईं टांग को घुटने से मोड़कर एड़ी को गुदे अंडकोष के बीच कास कर सटा लीजिए इस के तलवे एवं पंजों को दाएं जाघ से चिपका ले दोनों टांगों की हड्डियां एक दूसरे पर हो कमर रीढ गर्दन आदि सीधा रखें दोनों हाथों को नाभि के नीचे बहाजलि की दशा में रखें
सिद्धासन में ध्यान
आंख से नाक की लौ को देखें ललाट के मध्य में दबाव पड़ेगा इस दबाव को बनाए रखकर ध्यान एकाग्र चित्त कीजिए
लाभ
हृदय रोग पाचन रोग क्रिया की गड़बड़ी आदि ठीक होती है इसका वास्तविक लाभ मानसिक है कहा जाता है कि भगवान शंकर ने इसी मुद्रा में ध्यान लगाकर अपनी तीसरी नेत्र को महाशक्ति वान बनाया था
सावधानियां
उत्तर दिशा की ओर मुंह करके आशना लगाएं फार्म में 2 मिनट तक ही इस में ध्यान लगाए बाद में इसे बढ़ाते जाएं 15 मिनट से अधिक इस आसन में बैठने के लिए त्राटक बिंदु को केंद्रित करके कुशल अभ्यास आवश्यक है सामान्य लोगों के लिए 15 मिनट से अधिक ध्यान लगाना उचित नहीं है मस्ती की नसें वितरित हो जा सकती हैं इस आसन के अभ्यास के दिनों में गर्म या उत्तेजक पदार्थों का आहार पूर्णत वर्जित है नमक भी कम खाएं

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